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लक्ष्मीनारायण मंदिर, चंबा (Lakshminarayan Temple, Chamb)- ज्ञान की बातें

अप्रैल 8, 2026 अमित भारद्वाज 0 comments

लक्ष्मीनारायण मंदिर हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित है। ये मंदिर माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु जी को समर्पित है। ये मंदिर खंडेल पहाड़ी नामक एक प्राकृतिक पहाड़ी के एक हिस्से को काटकर बनाई गई कृत्रिम पहाड़ी की चोटी पर स्थित है।ये मंदिर अपने महान ऐतिहासिक महत्व और चमत्कार के लिए जाना जाता है। इसे राजा साहिल वर्मन द्वारा 10वीं शताब्दी में बनवाया गया था। जो चंबा राज्य के संस्थापक माने जाते हैं। मंदिर लगभग 1100 साल पुराना है और इसे भारत सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। इस परिसर में उत्तर से दक्षिण की ओर पंक्तिबद्ध छह मंदिर हैं। इनमें से तीन मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित हैं, जबकि बाकी भगवान शिव को। चंबा में आयोजित होने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार सुही माता मेला के नाम से जाना जाता है। ये मार्च-अप्रैल में चार दिनों के लिए हर साल आयोजित किया जाता है। 

लक्ष्मीनारायण मंदिर का इतिहास

श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर चंबा की नींव 10वीं शताब्दी में रखी गई थी। इसका निर्माण राजा साहिल वर्मन ने करवाया था, जो चंबा राज्य के संस्थापक माने जाते हैं। मंदिर लगभग 1100 साल पुराना है और इसे भारत सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु की मूर्ति दुर्लभ संगमरमर से बनाई गई थी, जिसे विंध्याचल पर्वत से लाया गया था। लोककथा के अनुसार राजा साहिल वर्मन को यह संगमरमर प्राप्त करने में बहुत संघर्ष करना पड़ा। मंदिर परिसर में मुख्य लक्ष्मीनारायण मंदिर के अलावा अन्य मंदिर भी हैं, जैसे राधा कृष्ण मंदिर (1825 में रानी सरदा द्वारा बनवाया गया), गौरी शंकर मंदिर और चंद्रगुप्त शिव मंदिर।

लक्ष्मीनारायण मंदिर के खुलने और बंद होने का समय

  • सुबह: 6 बजे – 12:30 बजे
  • दोपहर: 2:30 बजे
  • रात: 8:30 बजे तक

लक्ष्मीनारायण मंदिर पूजा का समय

  • सुबह की आरती: 6:00 बजे
  • शाम की आरती: 7:00 – 8:00 बजे तक

लक्ष्मीनारायण मंदिर की वास्तुकला

लक्ष्मीनारायण मंदिर की विशेषता मंदिर के डिजाइन और वास्तुकला इस तरह से से बनाई गई है की यहा भक्त प्रवेश द्वार पर ही खड़े होकर सभी देवी-देवताओं को देख सकते हैं। मंदिर प्रकार के मौसम के अनुकूल है। इसके साथ ही इस मंदिर के उत्तर से दक्षिण की दिशा की ओर एक पंक्ति में छह मंदिर हैं, जो भगवान विष्णु को समर्पित हैं। लक्ष्मीनारायण मंदिर के चारों ओर खूबसूरत अर्की हिल्स हैं। जो मंदिर के आसपास शांत वातावरण आपको सुकून देता है, और लुभावने दृश्य इसे और भी सुंदर बना देते है। राजा साहिल वर्मन द्वारा 10वीं शताब्दी में निर्मित लक्ष्मी नारायण मंदिर चंबा का मुख्य तीर्थ स्थल है जिसमें विमान यानी शिखर और गर्भगृह के साथ एक मंडप शामिल है। मंदिर में लकड़ी की छतरियां है और बर्फबारी से बचाने के लिए। एक पहिए के आकार की छत है जो ठंड से बचाने में मदद करती है। मंदिर में भगवान विष्णु की सवारी गरुड़ की धातु की छवि है। मंदिर पर कई राजाओं के अस्तित्व की छापये ऐतिहासिक महत्व और स्थापत्य कला के चमत्कार का एक सुंदर स्थान है। इसके परिसर में और भी अन्य मंदिर है जैसे राधा कृष्ण मंदिर- रानी सरदा द्वारा 1825 में बनवाया गया, चंद्रगुप्त का शिव मंदिर- साहिल वर्मन द्वारा बनवाया गया और गौरी शंकर मंदिर-युग्मन वर्मन द्वारा बनवाया गया। मुख्य द्वार के ऊपर धातु की बनी गरुड़ प्रतिमा है, जिसे राजा बलभद्र वर्मा ने स्थापित किया था। औरंगजेब ने मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया था। राजा छत्र सिंह ने साल 1678 में मंदिर में सोने की परत चढ़ाई।

अन्नपूर्णा माता मंदिर की कथा 

लक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण बिना किसी बलिदान के नहीं हुआ था। कहा जाता है कि राजा शाहिल वर्मन ने तय किया था । कि मूर्तियाँ संगमरमर से बनाई जानी चाहिए, इसलिए उन्होंने अपने नौ पुत्रों को विंध्य पर्वत पर संगमरमर की एक शिला लाने के लिए भेजा दिया। राजकुमार संगमरमर लेकर लौट तो आए। लेकिन जब मूर्तिकारों ने उस पर काम करना शुरू किया तो उन्होंने पाया कि वह संगमरमर भगवान विष्णु की मूर्ति बनाने के लिए ठीक नहीं है । इसलिए, यह तय किया गया कि उससे अन्य देवताओं की छोटी मूर्तियाँ बनाई जाएँ। धार्मिक कथा के अनुसार पत्थर की शिला से तीन मूर्तियाँ बनाई गईं । जिसमें त्रिमुख (तीन मुख वाले शिव), गणपति और भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी की थीं। राजा शाहिल वर्मन ने अपने आठ छोटे राजकुमारों को और मूर्तियाँ लाने के लिए विंध्य पर्वत पर वापस भेजा गया। विंध्य पर्वत से लौटते समय, राजकुमारों को डाकुओं के एक गिरोह ने मार डाला। इस त्रासदी से विचलित न होकर, राजा ने अपने सबसे बड़े पुत्र राजकुमार युगकारा को संगमरमर लाने के लिए भेजा। उन पर भी डाकुओं ने हमला कर दिया; लेकिन कुछ संन्यासी की सहायता से वे बच गए। संन्यासी ने राजकुमार को सुरक्षित चंबा लौटने में मदद की । और तब से ही चंबा में साधुओं का आदर किया जाता है और उन्हें कभी भी खाली हाथ वापस जाने की अनुमति नहीं दी जाती। बाद में, उसी संगमरमर से भगवान विष्णु की एक सुंदर मूर्ति बनाई गई और मंदिर में स्थापित की गई।

लक्ष्मी नारायण मंदिर कैसे पहुंचे

  • हवाई मार्ग – चंबा से लगभग 180 किलोमीटर दूर है कांगड़ा एयरपोर्ट। ये एयरपोर्ट दिल्ली और अन्य प्रमुख शहरों से कनेक्टेड है। एयरपोर्ट से टैक्सी या कैब लेकर चंबा तक पहुंच सकते हैं। 
  • रेल मार्ग – चंबा में रेलवे स्टेशन नहीं है। सबसे नजदीकी स्टेशन धर्मशाला या कांगड़ा में है। आप इन स्टेशनों से टैक्सी लेकर मंदिर जा सकते हैं।
  • सड़क मार्ग – कांगड़ा से चंबा की दूरी लगभग 150 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से यात्रा करने पर लगभग 5 से 6 घंटे का समय लगता है। हिमाचल रोडवेज और निजी बस कंपनियों द्वारा चंबा के लिए नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

निष्कर्ष

लक्ष्मीनारायण मंदिर चंबा हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का प्रतीक है। राजा साहिल वर्मन द्वारा 10वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर अपनी शिखर शैली की वास्तुकला, नक्काशी और आध्यात्मिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। आज भी यह मंदिर स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र है और पर्यटकों को प्राचीन भारत की झलक दिखाता है। यहां आकर आपको न सिर्फ शांति मिलेगी, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की समृद्ध विरासत का भी गहरा अनुभव होगा। अगर आप इतिहास प्रेमी हैं या आस्था के साथ घूमना पसंद करते हैं, तो यह जगह आपके लिए यादगार साबित होगी। हमारी वेबसाईट ज्ञान की बातें पर अधिक पढ़ें: https://www.gyankibaatein.com

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