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एकलिंगनाथ मंदिर, उदयपुर, राजस्थान (Ekling Nath Ji Mandir, Udaipur, Rajasthan) – ज्ञान की बातें

अप्रैल 9, 2026 अमित भारद्वाज 0 comments

राजस्थान के उदयपुर में स्थित एकलिंगनाथ जी मंदिर जिसे एकलिंगजी मंदिर भी कहा जाता है । भगवान शिव को समर्पित है। एकलिंग नाम का अर्थ है “एक और अद्वितीय लिंग” — जो भगवान शिव के अनुपम स्वरूप को दर्शाता है। ये मदिर उदयपुर शहर से लगभग 22 किलोमीटर उत्तर में कैलाशपुरी गांव के पास दो पहाड़ियों के बीच स्थित है। हिंदू धर्म में शिव को महादेव, विश्वकर्ता और जगदंबा के स्वरूप में पूजा जाता है। भगवान शिव श्री एकलिंग महादेव के रूप में मेवाड़ राज्य के महाराणाओं तथा अन्य राजपूतो के कुल देवता माने जाते है। एकलिंगनाथ जी मंदिर की स्थापना 8वीं शताब्दी में मेवाड़ वंश के संस्थापक बप्पा रावल द्वारा की गई थी। लगभग 1300 वर्ष पुराना यह मंदिर मूल रूप से 734 ईस्वी में बनाया गया। इतिहासकारों के अनुसार, मेवाड़ के महाराणा एकलिंगनाथ जी को अपना असली राजा मानते थे और खुद को उनके दीवान (मंत्री) कहते थे।

एकलिंगनाथ मंदिर का इतिहास

एकलिंगनाथ जी मंदिर की स्थापना 8वीं शताब्दी में मेवाड़ वंश के संस्थापक बप्पा रावल द्वारा की गई थी। लगभग 1300 वर्ष पुराना यह मंदिर मूल रूप से 734 ईस्वी में बनाया गया। इतिहासकारों के अनुसार, मेवाड़ के महाराणा एकलिंगनाथ जी को अपना असली राजा मानते थे और खुद को उनके दीवान (मंत्री) कहते थे। समय के साथ मंदिर पर कई आक्रमण हुए। बाद में महाराणा हमीर सिंह, राणा कुम्भा और राणा रायमल जैसे शासकों ने इसे मंदिर को दोबारा बनवाया और संरक्षित किया। आज भी मेवाड़ राजपरिवार के सदस्य राज्याभिषेक या महत्वपूर्ण अवसरों पर यहां पूजा-अर्चना करते हैं। मुख्य मंदिर में चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित है, जो काले पत्थर से बना है। इसमें भगवान शिव के चार मुख अलग-अलग दिशाओं में हैं, जो उनके विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माने हैं। मंदिर परिसर में 108 छोटे-छोटे मंदिर भी हैं, जो इसे और अधिक भव्य बनाते हैं।

एकलिंगनाथ मंदिर के खुलने और बंद होने का समय

  • सुबह: 4:00 -7:00 बजे
  • सुबह: 10:00 -1:30 बजे
  • शाम: 5:00 – 7:30 बजे तक

एकलिंगनाथ मंदिर पूजा का समय

  • सुबह की आरती: 5:30 – 8:15 बजे
  • दोपहर की आरती: 3:30 – 4:30 बजे
  • शाम की आरती: 5:00 – 6:30 बजे तक

एकलिंगनाथ मंदिर की वास्तुकला

एकलिंगजी मंदिर उदयपुर की वास्तुकला मेवाड़ शैली की उत्कृष्ट मिसाल है। दो मंजिला इस मंदिर को पिरामिड स्टाइल छत के साथ बनाया गया है। मंदिर के मध्य में काले संगमरमर से बनी एकलिंगजी की एक चार-मुखी मूर्ति है। कहा जाता है कि मंदिर में मौजूद भगवान शिव की मूर्ति लगभग 50 फीट है। मंदिर की दीवारों पर भी एक से एक बेहतरीन चित्र मौजूद है। यहां की दीवारों और स्तंभों पर नक्काशीदार जानवर, देवी-देवता और फूल-पत्तियों की नक्काशी देखने को मिलते है। मंदिर परिसर के बाहर इंद्रसागर (इंद्र सरोवर) नामक जलाशय है, जो पूरे क्षेत्र को और सुंदर बना देता है। यह जगह सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि मेवाड़ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर भी है। भक्त यहां शांति और आशीर्वाद पाने आते हैं।

एकलिंगनाथजी मंदिर की कथा

प्राचीन काल में नागदा (वर्तमान उदयपुर के पास) के जंगलों में एक गौशाला थी। एक दिन चरवाहे ने देखा कि एक गाय (नंदिनी) रोजाना अपने दूध को एक विशेष जगह पर गिरा रही है। जब उन्होंने खुद वह जा कर देखा तो उन्हों ने पाया कि दूध एक स्वयंभू शिवलिंग पर गिर रहा है। यह चमत्कार देखकर उन्होंने ऋषि हरित को सूचित किया। ऋषि ने ध्यान लगाया और जाना कि यह भगवान शिव का दिव्य स्वरूप है। उसी समय मेवाड़ वंश के युवा राजकुमार बप्पा रावल जंगलों में भटक रहे थे। ऋषि हरित ने उन्हें शिव भक्ति की दीक्षा दी और कहा कि वे इस स्थान पर भगवान का मंदिर बनवाएँ। बप्पा रावल ने भगवान शिव की कृपा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त की और मेवाड़ राज्य की नींव रखी। फिर उन्होंने 734 ईस्वी में एकलिंगनाथ जी मंदिर की स्थापना की और चतुर्मुखी शिवलिंग की प्रतिष्ठा की। “एकलिंग” नाम का अर्थ है “एक और अद्वितीय लिंग” — जो भगवान शिव के अनुपम स्वरूप को दर्शाता है। कहा जाता है कि मूल बाणलिंग इंद्रसागर में विसर्जित होने के बाद वर्तमान चतुर्मुखी स्वरूप की स्थापना हुई। चार मुख चार दिशाओं में हैं, जो शिव के ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सूर्य स्वरूपों का प्रतीक हैं।

एकलिंगनाथजी मंदिर में पूजा की विधि 

एकलिंगनाथजी मंदिर, उदयपुर, राजस्थान में पूजन की विधि बहुत ही सामान्य है, जो अनेक अन्य शिव मंदिरों में भी पाई जाती है। यहां पर मुख्यतः शिवलिंग की पूजा की जाती है, जो भगवान शिव का प्रतीक है।

  • स्नान: पूजन की शुरुआत में, शिवलिंग को जल से स्नान कराया जाता है। इसके लिए गंगाजल या पवित्र जल का उपयोग किया जाता है।
  • धूप और दीप: धूप और दीपक की उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है। प्रार्थनाओं के दौरान, धूप और दीपक जलाए जाते हैं, जो आराधना का हिस्सा होता है।
  • बिल्वपत्र और पुष्प: शिवलिंग पर बिल्वपत्र और पुष्प चढ़ाए जाते हैं। यह भगवान को समर्पित किया जाता है।
  • रुद्राक्ष और मृगचर्म: कई लोग शिवलिंग पर रुद्राक्ष माला और मृगचर्म रखते हैं। यह शिव की उपासना के एक रूप में किया जाता है।
  • मंत्र जाप: पूजा के दौरान, विभिन्न शिव मंत्रों का जाप किया जाता है। इससे भक्त अपनी आराधना में अधिक लगे रहते हैं और अपने मन को शुद्ध करते हैं।
  • प्रसाद: पूजन के बाद, प्रसाद की वितरण किया जाता है। यह भगवान की कृपा और आशीर्वाद के रूप में माना जाता है।

एकलिंगनाथजी मंदिर कैसे पहुंचे?

  • वाहन: उदयपुर में वाहन की सुविधा बहुत अच्छी है। शहर में टैक्सी, ऑटो रिक्शा, और प्राइवेट कार सेवाएं उपलब्ध हैं, जो मंदिर तक पहुँचने में मदद कर सकती हैं।
  • सार्वजनिक परिवहन: उदयपुर में सार्वजनिक परिवहन का भी सही इस्तेमाल किया जा सकता है। बस सेवाएं उदयपुर से अन्य शहरों और स्थानों से जुड़ी हैं, जिससे आसानी से एकलिंगनाथजी मंदिर तक पहुँचा जा सकता है।
  • टैक्सी सेवाएं: उदयपुर में कई टैक्सी सेवाएं उपलब्ध हैं, जो आपको शहर के अलग-अलग हिस्सों से मंदिर तक पहुँचा सकती हैं। आप ऑनलाइन या ऑफलाइन टैक्सी बुक कर सकते हैं।
  • रेलवे: उदयपुर को भारतीय रेलवे के माध्यम से भी पहुँचा जा सकता है। उदयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन से, मंदिर तक टैक्सी, ऑटोरिक्शा या सार्वजनिक परिवहन की सुविधा होती है।
  • हवाई यातायात: उदयपुर में महाराणा प्रताप आंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जिससे अन्य शहरों और विदेशों से आप उदयपुर तक हवाई यात्रा कर सकते हैं। हवाई अड्डे से आप टैक्सी या बस सेवाओं का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच सकते हैं।

निष्कर्ष

एकलिंगनाथ जी मंदिर उदयपुर न केवल भगवान शिव के भक्तों के लिए, बल्कि इतिहास और वास्तुकला प्रेमियों के लिए भी एक यादगार जगह है। यहां आने से मन को शांति मिलती है और मेवाड़ की गौरवशाली परंपराओं से जुड़ाव महसूस होता है। अगर आप उदयपुर घूमने जा रहे हैं। एकलिंगजी मंदिर राजस्थान के एक बार दर्शन कर लें तो आपको बार-बार यह आने का मन करता है। हमारी वेबसाईट ज्ञान की बातें पर अधिक पढ़ें: https://www.gyankibaatein.com। जय एकलिंगनाथ महादेव!

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