मुरूदेश्वर मंदिर जो कर्नाटक में कन्नड़ जिले के भटकल से 13 किमी दूर तहसील में स्थित है। ये मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मुरुदेश्वर भगवान शिव का ही एक नाम है। मुरुद का मतलब मिट्टी और ईश्वर का मतलब भगवान शिव होता है। ये मंदिर तीन ओर से अरब सागर से घिरा हुआ भगवान शिव का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। ये मंदिर और इसकी मूर्ति का निर्माण 1970 के दशक में शुरू हुआ था। मुरुदेश्वर की शिव प्रतिमा विश्व की सबसे ऊंची शिव प्रतिमाओं में से एक है। जो लगभग 123 फीट ऊंची है। इस मूर्ति को इस तरीके से बनाया गया है कि इस पर दिनभर सूर्य की किरणें पड़ती रहे, जिसकी वजह से ये मूर्ति हमेशा चमकती रहती है। इसे मूर्ति को बनाने में करीब दो साल का समय लगा था और करीब पांच करोड़ रुपये की लागत आई इस मंदिर का निर्माण 2008 में दोबारा हुआ था और इस मंदिर की ऊंचाई 249 फ़ीट है
मुरूदेश्वर मंदिर का इतिहास

मुरुदेश्वर मंदिर का इतिहास बहोत पुराना है रावण ने अमरत्व प्राप्त करने की इच्छा से शिव जी से आत्मलिंग मांगा था। तब शिव जी ने शर्त रखी कि लिंग को जमीन पर न रखा जाए। रास्ते में गणेश जी ने रावण को धोखा दिया और आत्मलिंग को यहां स्थापित कर दिया। रावण ने जब लिंग उठाने की कोशिश की तो वह बहुत गहराई में धंस गया। आज यही आत्मलिंग मुरुदेश्वर मंदिर में स्थापित है। आधुनिक स्वरूप में इस मंदिर का विस्तार 2008 में हुआ, जब स्थानीय व्यवसायी श्री रामा भट ने विशाल निर्माण करवाया।
मुरूदेश्वर मंदिर के खुलने और बंद होने का समय
- सुबह 6:00 -1:00 बजे
- दोपहर 3:00 – 8:30 बजे तक
मुरूदेश्वर मंदिर पूजा का समय

- सुबह की आरती: 6:30-7:30 बजे
- रात की आरती: 7:15- 8:15 बजे तक
मुरूदेश्वर मंदिर की वास्तुकला

मुरुदेश्वर मंदिर अपनी वास्तुकला और डिजाइन के लिए भारत के सबसे प्रभावशाली मंदिरों में से एक है। इस मंदिर की अनूठी शैली में द्रविड़ और नागर शैलियों के तत्व समाहित हैं। मंदिर का शिखर (मीनार) जमीन से 120 फीट ऊंचा है और इसमें 12 मीनारें हैं जो वर्ष के 12 महीनों का प्रतीक हैं। शिखर पर जटिल नक्काशी और मूर्तियां भी हैं जो हिंदू पौराणिक कथाओं के विभिन्न दृश्यों को दर्शाती हैं। मंदिर का मुख्य मंडप गोलाकार है और इसमें चार प्रवेश द्वार (गोपुरम) हैं जो विभिन्न दिशाओं में खुलते हैं। यह मंडप जटिल नक्काशी और मूर्तियों से सजे स्तंभों (प्रकारा) से सुशोभित है। मंदिर का गर्भगृह मंडप के केंद्र में स्थित है और इसमें भगवान शिव की 18 फीट ऊंची और 2 टन वजनी काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। भगवान शिव की यह प्रतिमा काले पत्थर से बनी है और इसमें त्रिशूल , शंख , चक्र और गदा जैसे विभिन्न शस्त्र धारण किए हुए चार भुजाएँ हैं। प्रतिमा के माथे पर एक तीसरी आँख भी है जो दिव्य प्रकाश से जगमगाती है। प्रतिमा को ऐसे रत्नों और आभूषणों से सजाया गया है जो उनकी शक्ति और महिमा को दर्शाते हैं।
मुरूदेश्वर मंदिर की कथा
रामायण काल में भी इस मंदिर की जिक्र मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, रामायण काल में रावण, शिव जी से अमरता का वरदान पाने के लिए तपस्या कर रहा था, तब शिवजी ने प्रसन्न होकर रावण को एक शिवलिंग दिया, जिसे आत्मलिंग कहा जाता है। इस आत्मलिंग के संबंध में शिवजी ने रावण से कहा था कि इस आत्मलिंग को लंका ले जाकर स्थापित करना, लेकिन इस बात का ध्यान रखना कि इसे जिस जगह पर रख दिया जाएगा, यह वहीं स्थापित हो जाएगा। अतः यदि तुम अमर होना चाहते हो तो इस लिंग को लंका ले जाकर ही स्थापित करना। रावण इस आत्मलिंग को लेकर चल दिया। सभी देवता यह नहीं चाहते थे कि रावण अमर हो जाए इसलिए विष्णु भगवान ने छल करते हुए शिवलिंग रास्ते में ही रखवा दिया। जब रावण को विष्णु का छल समझ आया तो वह क्रोधित हो गया और उस आत्मलिंग को नष्ट करने का प्रयास किया। सभी इस लिंग पर ढका हुआ वस्त्र उड़कर मुरुदेश्वर क्षेत्र में आ गया । इसी दिव्य वस्त्र के कारण यह तीर्थ क्षेत्र माना जाने लगा। शिव पुराण में इस कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है।
मुरुदेश्वर शिव मंदिर की दैनिक पूजा

- 1- रुद्राभिषेकम – भगवान शिव की रौद्र रूप में पूजा की जाती है। यह विशेष पूजा भगवान शिव को समर्पित है और माना जाता है कि इससे वातावरण शुद्ध होता है।
- 2- पंचामृत अभिषेकम – पंचामृत को एक पवित्र अमृत माना जाता है जो दूध, दही, शहद, घी और चीनी सहित पांच तरल पदार्थों के संयोजन से तैयार किया जाता है। इस विशेष पूजा में, शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराया जाता है।
- 3- पंचाकज्जाया- पंचाकज्जाया इस विशेष अनुष्ठान में भगवान शिव को चढ़ाया जाने वाला एक प्रकार का प्रसाद है। यह प्रसाद दक्षिण भारतीय क्षेत्र में लोकप्रिय है और आमतौर पर नारियल, किल, इलायची और घी से बनाया जाता है।
- 4- बिल्वार्चन – इस पूजा में, भगवान शिव को बिल्व के पत्ते चढ़ाए जाते हैं।
- 5- चंदन अभिषेकम – चंदन अक्सर हिंदू अनुष्ठानों में इसकी शुभता और शीतलता के कारण उपयोग किया जाता है। इस पूजा में लिंगम को चंदन से स्नान कराया जाता है।
- 6- भस्मार्चन – हिंदू भगवान शिव को अग्नि के रूप में पूजते हैं। यह पूजा शिवलिंग पर भस्म लगाकर की जाती है।
- 7 – एकादश रुद्र – हिंदू पुराणों के अनुसार, रुद्र के ग्यारह रूप हैं, जिनमें शिव, महारुद्र, ईशान, विजय रुद्र, शंकर, नीललोहित, भीम, देवदेव, भवोद्भव, आदित्यमक श्रीरुद्र आदि शामिल हैं।
मुरुदेश्वर शिव मंदिर कैसे पहुंचे
- हवाई मार्ग – मुरुदेश्वर मंदिर के लिए निकटतम हवाई अड्डा मैंगलोर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो मंदिर से 165 किलोमीटर दूर है। हवाई अड्डे पर पहुंचने के बाद, मंदिर तक पहुंचने के लिए कोई टैक्सी बुक कर सकते है।
- रेल मार्ग – मंदिर के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन मुरुदेश्वर रेलवे स्टेशन है, जो मंदिर से लगभग 8 किलोमीटर दूर है। आप मंदिर तक पहुंचने के लिए गोकर्ण में शीर्ष कार रेंटल कंपनियों से टैक्सी बुक कर सकते हैं।
- सड़क मार्ग – बस से मंदिर आने वाले लोग निकटतम बस स्टॉप, मुरुदेश्वर बस स्टेशन पर आ सकते हैं, जो मंदिर से बहुत दूर नहीं है।
निष्कर्ष
मुरुदेश्वर मंदिर केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत मिलन है। 123 फीट की भव्य शिव मूर्ति और अरब सागर की लहरों के बीच खड़ा यह मंदिर हर आने वाले को शांति और ऊर्जा प्रदान करता है। अगर आप शिव भक्ति के साथ-साथ समुद्री यात्रा का आनंद लेना चाहते हैं, तो मुरुदेश्वर जरूर जाएं। हमारी वेबसाईट ज्ञान की बातें पर अधिक पढ़ें: https://www.gyankibaatein.com। हर हर महादेव! 🙏

