ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
एक ही जगह: आरती, चालीसा, व्रत, कथा, मंदिर, पंचांग, ग्रंथ और उपयोगी धार्मिक जानकारी।
होम धार्मिक स्थल तारा देवी मंदिर, हिमाचल (Tara Devi Mandir, Himachal) – ज्ञान की बातें
धार्मिक स्थल

तारा देवी मंदिर, हिमाचल (Tara Devi Mandir, Himachal) – ज्ञान की बातें

अप्रैल 6, 2026 अमित भारद्वाज 0 comments

तारा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के शिमला में स्थित है यह मंदिर 250 साल पुराना है। माता तारा, दुर्गा मां की नौवीं बहन है। तारा, एकजुट और नील सरस्वती माता तारा के तीन स्वरुप हैं। बृहन्नील ग्रंथ में माता तारा के तीन स्वरूपों के बारे में बताया गया है। सबको तारने वाली मां तारा की पूजा हिंदू और बौद्ध दोनों की धर्मों में की जाती है। मान्यता के अनुसार , तारा देवी को पश्चिम बंगाल से सेन साम्राज्य के राजा लाये थे। बाद में राजा भूपेंद्र सेन ने ईस मंदिर को लकड़ी और वैष्णव तरीके से तैयार करवाया था। ये समुद्र तल से लगभग 7200 फीट की ऊंचाई पर बसा यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य का भी अनुपम नजारा पेश करता है। मान्यता है कि जो भी भक्त मां तारा के दरबार में पहुंचता है। उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। लेकिन इस मंदिर की सबसे रोचक बात है इसकी प्राचीन कथा और 250 वर्ष पुराना इतिहास।

तारा देवी मंदिर का इतिहास

यह मंदिर लगभग 250 वर्ष पुराना माना जाता है। इसका निर्माण 18वीं शताब्दी में सेन वंश के राजाओं द्वारा करवाया गया था। सेन राजवंश बंगाल से जुड़ा था और माता तारा उनकी कुलदेवी थीं। कथाओं के अनुसार, माता की मूर्ति मूल रूप से बंगाल से हिमाचल लाई गई थी। पहले यहां लकड़ी की मूर्ति स्थापित की गई थी। बाद में राजा बलबीर सेन ने सपने में माता के आदेश पर ताराव पहाड़ी की चोटी पर भव्य मंदिर बनवाया और अष्टधातु (आठ धातुओं से बनी) की भव्य 18 भुजाओं वाली मूर्ति स्थापित की। इस मूर्ति को हाथी ‘शंकर’ पर लादकर यहां लाया गया था।

तारा देवी मंदिर के खुलने और बंद होने का समय

खुलने का समय : सुबह 7:00 बजे

बंद होने का समय : शाम 6:30 बजे।

तारा देवी मंदिर पूजा का समय

सुबह की आरती: 8:00 बजे
भोग आरती: 12:00 बजे
शाम की आरती: 5.00 बजे

तारा देवी मंदिर की वास्तुकला

पहाड़ी शैली की वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति के रूप में, तारा देवी मंदिर का पूरी तरह से पुनर्निर्माण किया गया है क्योंकि निर्माण में इस्तेमाल की गई लकड़ी लंबे समय तक हवा में रहने के कारण अपनी बनावट बदल चुकी थीं। मंदिर को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने में 6 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आई। आप लोग एक पवित्र स्थान पर सोने और चांदी का भारी उपयोग भी देखेंगे। इस धार्मिक स्थल का एक और आकर्षक हिस्सा शिमला के शांत वातावरण में इसकी शांति है। यहां पर हर जगह सकारात्मकता का आभास होता है।

तारा देवी मंदिर की कथा

तारा देवी का इतिहास करीब 250 साल पुराना है। कहा जाता है कि एक बंगाल के सेन राजवंश के राजा शिमला आए। वह एक दिन घने जंगलों के बीच शिकार खेलने गए थे। थकान के कारण राजा भूपेन्द्र सेन को नींद आ गई। सपने में राजा ने मां तारा के साथ उनके द्वारपाल श्री भैरव और भगवान हनुमान को सपने में देखा। मां तारा ने राजा से कहा कि वे आम लोगों के सामने प्रकट होना चाहती हैं ताकि सभी भक्त उनके आशीर्वाद से लाभान्वित हो सकें। सपने से जागने के बाद राजा भूपेंद्र सेन बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने मंदिर निर्माण के लिए ने 50 बीघा जमीन दान कर मंदिर का निर्माण कार्य शुरू किया। और ताराव पहाड़ी की चोटी पर मंदिर बनवाया। मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो जाने के बाद मां तारा की मूर्ति को वैष्णव परंपरा के अनुसार स्थापित किया गया। ये मूर्ति लकड़ी से तैयार करवाई गई थी। कुछ समय बाद राजा भूपेन्द्र के वंशज बलवीर सेन को भी सपने में मां तारा के दर्शन हुए। उनके निर्देश पर अष्टधातु (आठ धातुओं से बनी) भव्य मूर्ति बनवाई गई। यह मूर्ति लगभग डेढ़-दो फीट ऊंची है और 18 भुजाओं वाली बताई जाती है। मूर्ति को हाथी शंकर के माध्यम से पहाड़ी की चोटी तक पहुंचाया गया। इसके बाद बलवीर सिंह ने मंदिर में अष्टधातु से बनी मां तारा देवी की मूर्ति स्थापित करवाई और मंदिर का पूर्ण रूप से निर्माण करवाया। कई भक्तों का मानना है कि यह मंदिर देवी तारा की कुलदेवी के रूप में सेन वंश से जुड़ा हुआ है।

शिव कुटिया कराती है कैलाश का आभास

तारा देवी मंदिर से कुछ दूरी पर शिव कुटिया बनी हुई हैं। घने जंगल में स्थित ये मंदिर भगवान शिव के कैलाश में होने का आभास कराता है। जंगल के अन्य हिस्सों की तुलना में इस मंदिर का तापमान कम होता है। माना जाता है कि कई साल पहले एक संत यहां ध्यान किया करते थे। ठंड में वह संत केवल एक लंगोट में ही यहां तपस्या करते थे।

तारा देवी मंदिर कैसे पहुंचे

हवाई मार्ग – यहां पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जुब्बरहट्टी हवाई अड्डा है, जो गंतव्य से 22 किमी की दूरी पर है। वहीं से आप कैब या टैक्सी के द्वारा मंदिर पहुंच सकते है।

रेल मार्ग – यहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन शिमला है। चंडीगढ़ से आने वाले लोग कालका रेलवे स्टेशन से तारा देवी स्टेशन तक टॉय ट्रेन की सवारी का भी आनंद ले सकते हैं।

सड़क मार्ग – तारा देवी मंदिर तक पहुंचने का दूसरा रास्ता शोघी से है, जो सड़क मार्ग से शहर के सभी हिस्सों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। कई निजी और सार्वजनिक स्वामित्व वाली बसें उपलब्ध हैं। आपको कालका-शिमला राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरते हुए भी मंदिर के दर्शन करने का मौका मिल सकता है।

निष्कर्ष

तारा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश की आस्था और इतिहास का जीवंत प्रमाण है। राजा भूपेंद्र सेन को मिले दिव्य दर्शन से शुरू हुई यह कथा आज भी लाखों भक्तों को आकर्षित करती है। अगर आप शिमला घूमने जा रहे हैं तो एक बार माता तारा मंदिर के दर्शन जरूर करें। मनोकामना पूरी करने के लिए यहां आने वाले भक्त अक्सर कहते हैं – “जय माता तारा, जो सच्चे मन से आता है, उसकी हर इच्छा पूरी करती है। हमारी वेबसाईट ज्ञान की बातें पर अधिक पढ़ें: https://www.gyankibaatein.comजय माता दी!

In-Content Ad / Sponsor Slot