स्तोत्र (stotra)

ललिता देवी स्तोत्र – ललिता देवी की महिमा का दिव्य वर्णन ( Lalita Devi Stotra Lyrics with Meaning) – ज्ञान की बातें

139views

ललिता देवी स्तोत्र माँ ललिता को समर्पित स्तोत्र है हिंदू धर्म में माँ ललिता देवी का विशेष स्थान माना जाता है और श्री ललिता स्तोत्र उसकी सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है। यह ब्रह्मांड पुराण के उत्तर खंड में वर्णित है, जहां हयग्रीव और अगस्त्य ऋषि के संवाद के माध्यम से माँ ललिता (त्रिपुर सुंदरी) के एक हजार नामों का वर्णन किया गया है। ये स्तोत्र एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है जो आपको काले जादू से बचाता है। माँ ललिता को षोडशी, त्रिपुर सुंदरी, राज राजेश्वरी आदि नामों से भी जाना जाता है। इन नामों का जप करने से भक्त को आध्यात्मिक उन्नति, मनोकामना पूर्ति, सुख-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। खासकर नवरात्रि, ललिता जयंती और शुक्रवार के दिन इस स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

ललिता देवी स्तोत्र का इतिहास और महत्व

यह स्तोत्र देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी की स्तुति में है, जिसमें मातृकाओं, अक्षरशक्तियों और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की ऊर्जा के रूप में देवी की महिमा का वर्णन किया गया है। ललिता देवी को सृष्टि, शक्ति और शब्द ब्रह्म की अधिष्ठात्री बताया गया है। ललिता स्तोत्र में माँ के नामों का सम्पूर्ण वर्ण किया गया है पवित्र भावों के साथ माँ के नामों की स्तुति करने मात्र से ही साधक का मन पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाता है और उसे अपने भीतर दिव्य ऊर्जा का अनुभव होता है। माँ के ये नाम एक साधक को माँ के साथ गहन आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने में मदद करते है। इनके जप से साधक आत्म-साक्षात्कार के पथ पर अग्रसर होता है। ललिता सहस्रनाम के उच्चारण मात्र से मन को शांति मिलती है, और जीवन से नकारात्मकता समाप्त हो जाती है

ललिता देवी स्तोत्र के संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अर्थ

गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम् ।

देवीं मन्त्रमयीं नौमि मातृकापीठरूपिणीम् ॥ १०॥

अर्थ
मैं उस देवी को नमस्कार करता हूँ जो गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी और राशियों के रूप में विराजमान हैं।
जो स्वयं मन्त्रस्वरूपा हैं, और जिनका शरीर मातृकाओं के पवित्र पीठों के रूप में व्याप्त है।

प्रणमामि महादेवीं मातृकां परमेश्वरीम् ।

कालहृल्लोहलोल्लोहकलानाशनकारिणीम् ॥ ११॥

अर्थ
मैं परमेश्वरी महादेवी मातृका को प्रणाम करता हूँ,
जो काल, आकर्षण, विकर्षण और कलाओं के नाश की भी कारण हैं।

यदक्षरैकमात्रेऽपि संसिद्धे स्पर्द्धते नरः ।

रवितार्क्ष्येन्दुकन्दर्पैः शङ्करानलविष्णुभिः ॥ १२॥

अर्थ
जिसके एक अक्षर की सिद्धि से ही मनुष्य सूर्य, चन्द्र, अग्नि, विष्णु, शंकर और कामदेव के समान तेजस्वी हो उठता है,
उस देवी की मैं वंदना करता हूँ।

यदक्षरशशिज्योत्स्नामण्डितं भुवनत्रयम् ।

वन्दे सर्वेश्वरीं देवीं महाश्रीसिद्धमातृकाम् ॥ १३॥

अर्थ
जिसके अक्षरों की चाँदनी से तीनों लोक प्रकाशित हैं,
उस सर्वेश्वरी, महाश्री, सिद्धमातृका देवी को नमस्कार।

यदक्षरमहासूत्रप्रोतमेतज्जगत्त्रयम् ।

ब्रह्याण्डादिकटाहान्तं तां वन्दे सिद्धमातृकाम् ॥ १४॥

अर्थ
जिसके अक्षररूप महान् सूत्र में सम्पूर्ण जगत्त्रय — ब्रह्माण्ड से लेकर अणु तक — पिरोया गया है,
उस सिद्धमातृका देवी की मैं वंदना करता हूँ।

यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयोद्भवम् ।

ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं जगदद्यापि दृश्यते ॥ १५॥

अर्थ
जिसका त्रिकोणात्मक बीज सम्पूर्ण जगत का मूलाधार है,
उस देवी को नमस्कार।

अकचादिटतोन्नद्धपयशाक्षरवर्गिणीम् ।

ज्येष्ठाङ्गबाहुहृत्कण्ठकटिपादनिवासिनीम् ॥ १६॥

अर्थ
जो ‘अ’ से ‘क्ष’ तक के अक्षरसमूह में व्याप्त हैं,
और शरीर के प्रत्येक अंग में निवास करती हैं — ऐसी मातृका देवी को प्रणाम।

नौमीकाराक्षरोद्धारां सारात्सारां परात्पराम् ।

प्रणमामि महादेवीं परमानन्दरूपिणीम् ॥ १७॥

अर्थ
जो काराक्षर (क-क्ष) से परे, सार की भी सार और परमानन्द स्वरूपा हैं — उन्हें प्रणाम।

अथापि यस्या जानन्ति न मनागपि देवताः ।

केयं कस्मात्क्व केनेति सरूपारूपभावनाम् ॥ १८॥

अर्थ
यह कौन हैं, कहाँ हैं, कैसी हैं — इसका ज्ञान देवता भी नहीं जानते।
वे रूप और अरूप दोनों से परे हैं।

वन्दे तामहमक्षय्यां क्षकाराक्षररूपिणीम् ।

देवीं कुलकलोल्लोलप्रोल्लसन्तीं शिवां पराम् ॥ १९॥

अर्थ
जो ‘क्ष’ अक्षर के रूप में विद्यमान, अविनाशी और शिवस्वरूपा हैं,
जो शक्ति और चेतना की लहरियों में प्रफुल्लित हैं — उन्हें नमस्कार।

वर्गानुक्रमयोगेन यस्याख्योमाष्टकं स्थितम् ।

वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्ध्यादिकेश्वरीम् ॥ २०॥

अर्थ
जिनके आठ वर्ण-वर्गों से यह सम्पूर्ण ध्वनि-विश्व बना,
उनसे उत्पन्न सभी सिद्धियाँ जिनकी अधीन हैं — ऐसी देवी को नमस्कार।

कामपूर्णजकाराख्यसुपीठान्तर्न्निवासिनीम् ।

चतुराज्ञाकोशभूतां नौमि श्रीत्रिपुरामहम् ॥ २१॥

अर्थ
जो कामपूर्ण ‘ज’ अक्षर के सुपीठ में निवास करती हैं,
जो चतुर्विध आज्ञाकोश की अधिष्ठात्री हैं — उस श्रीत्रिपुरा देवी को नमस्कार।

एतत्स्तोत्रं तु नित्यानां यः पठेत्सुसमाहितः ।

पूजादौ तस्य सर्वास्ता वरदाः स्युर्न संशयः ॥ २२॥

अर्थ
जो इस स्तोत्र को एकाग्रचित्त होकर पढ़ता है,
उसकी पूजा में सभी देवियाँ प्रसन्न होकर वर देती हैं — इसमें कोई संशय नहीं।

ललिता देवी स्तोत्र के लाभ और जाप विधि

ललिता स्तोत्र के पाठ से मनुष्य को कई लाभ मिलते हैं। ललिता स्तोत्र का पाठ माँ ललिता देवी की कृपा और आशीर्वाद को पाने का सबसे सुगम माध्यम है। भक्तों द्वारा पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ ललिता स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में ऐश्वर्य और संमृद्धि आती है और रुके हुआ काम बने लगते है

जाप विधि:

ललिता देवी स्तोत्र का पाठ करने से पहले स्नान करे फिर शुद्ध वस्त्र पहनें और एक शुद्ध स्थान पर बैठें। माँ ललिता की चित्र या मूर्ति को गुलाबी रंग के कपड़े या लाल रंग के कपड़े पर स्थापित करे माँ पर धूप , दीप , फूल और चंदन अर्पित करे ललिता देवी स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करे उच्चारण शुद्ध रखें; अर्थ जानकर पाठ करें। अंत में ललिता देवी की आरती के साथ समापन करें। 

निष्कर्ष

माँ ललिता के ये हजार नाम सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि शक्ति के बीज हैं। इस स्तोत्र को अपनी रोजमर्रा की पूजा में शामिल करें और माँ की कृपा प्राप्त करें। अगर आप भक्ति में रुचि रखते हैं, तो हमारी साइट ज्ञान की बातें पर अन्य स्तोत्र जैसे कुलदेवी स्तोत्र और गायत्री स्तोत्र को जरूर पढ़ें तथा इस आर्टिकल को शेयर करें और कमेंट में अपनी अनुभूति बताएं! जय माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी!


Leave a Response