श्री शालिग्राम स्तोत्र – भगवान शालिग्राम की महिमा का दिव्य वर्णन (Shri Shaligram Stotra Lyrics with Meaning) – ज्ञान की बातें
श्री शालिग्राम स्तोत्र भगवान शालिग्राम को समर्पित है ये स्तोत्र श्री शालिग्राम की सम्पूर्ण महिमा का वर्णन करता है ईस स्तोत्र के पाठ से जीवन में साहस, आत्मविश्वास और सुरक्षा की अनुभूति होती है। हिन्दू मान्यता के अनुसार भगवान शालिग्राम श्री हरि विष्णु भगवान का स्वरूप माने जाते हैं। जो एक शिला के रूप में पूजे जाते हैं और ये शिला नेपाल में गंडकी नदी के तल में पायी जाती है। यह कोई साधारण शिला या पत्थर नहीं होता, बल्कि इसमें भगवान विष्णु का निवास माना जाता है। इन पर शंख, चक्र, गदा, पद्म जैसे चिन्ह बने होते हैं। ये स्वयंभू होने की वजह से इनकी प्राण प्रतिष्ठा की जरूरत नहीं होती। यानी भक्त इन्हें घर में लाकर सीधे पूज सकते हैं। घर में भगवान शालिग्राम की पूजा करने से कभी भी धन व वैभव की कमी नहीं होती। और परिवार में सुख-समृद्धि, बनी रहती है
श्री शालिग्राम स्तोत्र का इतिहास और महत्व
शालिग्राम शिला भगवान विष्णु का दिव्य स्वरूप मानी जाती है। नेपाल की गंडकी नदी में पाई जाने वाली यह पवित्र शिला घर में पूजी जाती है। हिन्दू कथा के अनुसार, वृंदा नाम की एक स्त्री थीं जिनका विवाह दानवराज जालंधर से हुआ था। जालंधर को हरा पाना लगभग असंभव था। तब भगवान विष्णु ने जालंधर को मारने की एक योजना बनाई। भगवान जानते थे कि जालंधर को तभी मारा जा सकता है जब उसकी पत्नी का पतिव्रता धर्म टूटेगा। भगवान विष्णु जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के पास पहुंच गए और उसका सतीत्व भंग हो गया और जालंधर मारा गया। जब वृंदा को इस छल का पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को शिला बनने का श्राप दे दिया। कहते हैं यही शिला शालिग्राम कहलाई। ईस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से सभी पाप नष्ट होते हैं, रोग-दुख दूर होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
श्री शालिग्राम स्तोत्र के संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अर्थ
श्रीरामं सह लक्ष्मणं सकरुणं सीतान्वितं सात्त्विकं वैदेहीमुखपद्मलुब्धमधुपं पौलस्त्वसंहारिणम् ।
वन्दे वन्द्यपदांबुजं सुरवरं भक्तानुकंपाकरं शत्रुघेन हनूमता च भरतेनासेवितं राघवम् ॥
मैं उस राघव (श्रीराम) को वन्दन करता हूँ, जो लक्ष्मण के साथ हैं, स्नेहशील और सीता के साथ युक्त हैं, जो सात्त्विक हैं, वैदेही के कमल सदृश चरणों के भूखे मधु-पापों का संहार करने वाले हैं। वे देवों के प्रिय हैं, भक्तों के प्रति करुणामय हैं, शत्रुओं को हरने वाले हैं और हनुमान तथा भरत की सेवा से पूजित हैं।
जयति जनकपुत्री लोकभर्त्री नितान्तं जयति जयति रामः पुण्यपुञ्जस्वरूपः ।
जयति शुभगराशिर्लक्ष्मणो ज्ञानरूपो जयति किल मनोज्ञा ब्रह्मजाता ह्ययोध्या ॥
वह राम, जो जनक की पुत्री सीता के पति हैं और सम्पूर्ण लोक के पालनकर्ता हैं, उनका जय हो। जो पुण्य के संचय स्वरूप हैं। लक्ष्मण, जो शुभ और ज्ञान रूप हैं, उनका भी जय हो। हे सुन्दर और मनोहर, ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न और अयोध्या में स्थित, उनका जय हो।
(युधिष्ठिर उवाच)
श्रीदेवदेव देवेश देवतार्चनमुत्तमम् ।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि ब्रूहि मे पुरुषोत्तम ॥१
हे पुरुषोत्तम! मैं यह जानना चाहता हूँ कि देवों के देव, श्रेष्ठ देवतार्चना की विधि क्या है। कृपया मुझे इसका वर्णन करें।
गण्डक्यां चोत्तरे तीरे गिरिराजस्य दक्षिणे ।
दशयोजनविस्तीर्णा महाक्षेत्रवसुन्धरा ॥२
गिरिराज के दक्षिण में, गंडक नदी के उत्तरी तट पर, दस योजना विस्तृत इस विशाल भूमि (महाक्षेत्र) में शालग्राम स्थित है।
शालग्रामो भवेद्देवो देवी द्वारावती भवेत् ।
उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः ॥३
जहाँ शालग्राम और द्वारावती (देवी) एक साथ स्थित हैं, वहाँ मोक्ष निश्चित रूप से प्राप्त होता है।
शालग्रामशिला यत्र यत्र द्वारावती शिला ।
उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः ॥४
जहाँ-जहाँ शालग्राम और द्वारावती शिला एकसाथ हैं, वहाँ मोक्ष प्राप्ति में कोई संदेह नहीं है।
आजन्मकृतपापानां प्रायश्चित्तं य इच्छति ।
शालग्रामशिलावारि पापहारि नमोऽस्तु ते ॥५
जो व्यक्ति अपने आजन्म किए पापों का प्रायश्चित्त करना चाहता है, वह शालग्राम शिला की पूजा करके अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करता है।
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् ।
विष्णोः पादोदकं पीत्वा शिरसा धारयाम्यहम् ॥६
शालग्राम के पादोदक (पादजल) को पीकर सिर पर धारण करने से अकाल मृत्यु और सभी प्रकार की व्याधियों का नाश होता है।
शङ्खमध्ये स्थितं तोयं भ्रामितं केशवोपरि ।
अङ्गलग्नं मनुष्याणां ब्रह्महत्यादिकं दहेत् ॥७
यदि कोई मनुष्य शंख मध्य में स्थित जल को केशव (भगवान विष्णु) पर लगाकर स्नान करता है, तो यह ब्रह्महत्या जैसे महान पापों को नष्ट करता है।
स्नानोदकं पिवेन्नित्यं चक्राङ्कितशिलोद्भवम् ।
प्रक्षाल्य शुद्धं तत्तोयं ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥८
जो व्यक्ति नित्य स्नानजल में चक्रांकित शिला को देख कर स्नान करता है और जल से शुद्ध होता है, उसके सभी पाप (ब्राह्महत्या आदि) नष्ट हो जाते हैं।
अग्निष्टोमसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।
सम्यक् फलमवाप्नोति विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात् ॥९
अग्निष्टोम और वाजपेय जैसे यज्ञ हजारों बार करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल व्यक्ति को शालग्राम के नैवेद्य से प्राप्त होता है।
नैवेद्ययुक्तां तुलसीं च मिश्रितां विशेषतः पादजलेन विष्णोः ।
योऽश्नाति नित्यं पुरतो मुरारेः प्राप्नोति यज्ञायुतकोटिपुण्यम् ॥१०
जो व्यक्ति तुलसी से मिश्रित शालग्राम का पादजल नियमित रूप से ग्रहण करता है, वह मुरारी (भगवान कृष्ण/विष्णु) के सामने हजारों यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त करता है।
खण्डिताः स्फुटिता भिन्ना वह्निदग्धास्तथैव च ।
शालग्रामशिला यत्र तत्र दोषो न विद्यते ॥११
भले ही शालग्राम की शिला खंडित या जली हुई हो, वहाँ किसी प्रकार का दोष नहीं होता।
न मन्त्रः पूजनं नैव न तीर्थं न च भावना ।
न स्तुतिर्नोपचारश्च शालग्रामशिलार्चने ॥१२
शालग्राम की पूजा में कोई विशेष मंत्र, तीर्थ या भाव की आवश्यकता नहीं है।
ब्रह्महत्यादिकं पापं मनोवाक्कायसम्भवम् ।
शीघ्रं नश्यति तत्सर्वं शालग्रामशिलार्चनात् ॥१३
ब्रह्महत्या जैसे बड़े पाप भी, जो मन, वाक् और शरीर से उत्पन्न हुए हों, शालग्राम शिला की पूजा से शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
नानावर्णमयं चैव नानाभोगेन वेष्टितम् ।
तथा वरप्रसादेन लक्ष्मीकान्तं वदाम्यहम् ॥१४
शालग्राम विभिन्न रंगों और भोगों से परिपूर्ण होते हैं। इसके वरप्रसाद द्वारा लक्ष्मी-कान्ति (सौभाग्य) प्राप्त होती है।
नारायणोद्भवो देवश्चक्रमध्ये च कर्मणा ।
तथा वरप्रसादेन लक्ष्मीकान्तं वदाम्यहम् ॥१५
नारायण (भगवान विष्णु) के उत्पत्ति और कर्म चक्र मध्य में होने के कारण, शालग्राम की पूजा से लक्ष्मी-कान्ति (सौभाग्य) प्राप्त होती है।
कृष्णे शिलातले यत्र सूक्ष्मं चक्रं च दृश्यते ।
सौभाग्यं सन्ततिं धत्ते सर्व सौख्यं ददाति च ॥१६
शालग्राम की शिला के तल पर सूक्ष्म चक्र देखने को मिले, वहाँ का पूजन करने से संतान सुख, सौभाग्य और सम्पूर्ण सुख प्राप्त होता है।
वासुदेवस्य चिह्नानि दृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते ।
श्रीधरः सुकरे वामे हरिद्वर्णस्तु दृश्यते ॥१७
श्री शालिग्राम स्तोत्र के लाभ और जाप विधि
भगवान शालिग्राम की पूजा करना हिंदू परंपरा में गहराई से निहित है और माना जाता है कि इससे भक्तों को कई आध्यात्मिक और भौतिक लाभ मिलते हैं। कहा जाता है कि भगवान शालिग्राम की भक्ति दिल और दिमाग को शुद्ध करती है, जिससे धार्मिकता और सदाचार का जीवन व्यतीत होता है। भगवान शालिग्राम की नियमित पूजा आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि और मन की स्पष्टता प्राप्त करने में मदद करती है। ऐसा माना जाता है कि यह नकारात्मक ऊर्जाओं और प्रभावों से सुरक्षा प्रदान करता है। कर्म ऋणों को संतुलित करने में मदद करता है, जिससे जीवन अधिक सामंजस्यपूर्ण होता है।
जाप विधि:
श्री शालिग्राम स्तोत्र का पाठ करने से पहले स्नान करे स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा के लिए एक स्वच्छ और पवित्र स्थान पर बैठें।फिर श्री शालिग्राम जी को पंचामृत दूध, दही, शहद, शक्कर, घी से स्नान कराएं। भगवान की मूर्ति को पूजा स्थल पर स्थापित करे। इसके बाद भगवान शालिग्राम को चंदन का तिलक लगाएं और धूप , दीप , फूल ,फल वह घर में बना हुआ भोग अर्पित करें। श्री शालिग्राम स्तोत्र का पूरी श्रद्धा से पाठ करें। अंत में भगवान शालिग्राम की आरती करें। भोग में तुलसी का पत्ता जरूर डालें। और सभी लोगों में प्रसाद बांटें।
निष्कर्ष
यह स्तोत्र श्री शालिग्राम भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ईसके नित्य पाठ से आध्यात्मिक शांति मिलती है। अगर आप शालिग्राम शिला की पूजा कर रहे हैं, तो इस स्तोत्र को आपने पूजा में जरूर अवश्य शामिल करें। और हमारी वेबसाईट ज्ञान की बातें पर अन्य स्तोत्र जैसे श्री भैरव तांडव स्तोत्र और श्री हनुमान नवरत्न स्तोत्र को भी जरूर पढ़ें तथा इस आर्टिकल को शेयर करें और कमेंट में अपनी अनुभूति जरूर बताएं!





