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श्री हनुमान नवरत्न स्तोत्र – हनुमान जी की महिमा का दिव्य वर्णन (Shri Hanuman Navaratna Stotra Lyrics with Meaning) – ज्ञान की बातें

जनवरी 3, 2026 अमित भारद्वाज 0 comments

श्री हनुमान नवरत्न स्तोत्र भगवान हनुमान को समर्पित है ये एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली स्तोत्र है नवरत्न स्तोत्र का अर्थ है “नौ रत्नों के समान अमूल्य श्लोकों वाला स्तोत्र”। यह स्तोत्र श्रीवल्लभाचार्य जी द्वारा रचित माना जाता है ये स्तोत्र भक्ति मार्ग का अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें कुल नौ श्लोक हैं — प्रत्येक श्लोक भक्ति, समर्पण और विश्वास का एक रत्न है। भगवान हनुमान राम भक्तों के आराध्य हैं। उनकी भक्ति करने से जीवन में साहस, शक्ति और सुरक्षा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र केवल भक्तिपूर्ण भाव से पढ़ने मात्र से ही भक्तों के भय, रोग, संकट, शत्रु, ग्रहदोष, और मानसिक तनाव का नाश होता है हनुमान जी की आराधना में यह स्तोत्र रामकार्य सिद्धि, बल, बुद्धि, विजय और निर्भयता प्रदान करने वाला माना गया है। इस स्तोत्र का पाठ मंगलवार, शनिवार या हनुमान जयंती के दिन करने से श्रीराम भक्ति, साहस, आत्मविश्वास और संकटमोचन कृपा की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र सिखाता है कि जब भक्त अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित कर देता है — तब उसे संसार की किसी भी बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। भगवान स्वयं उसके रक्षक, कर्ता और नियंता बन जाते हैं।

श्री हनुमान नवरत्न स्तोत्र का इतिहास और महत्व

श्री हनुमान नवरत्न स्तोत्र एक विशेष स्तोत्र है, जिसमें हनुमान जी के नौ प्रमुख गुणों (नवरत्नों) का वर्ण किया गई है। यह स्तोत्र हनुमान जी के नौ रत्नों जिसे बल, बुद्धि, भक्ति, वीर्य, शौर्य, धैर्य, राम सेवा, शत्रु नाश की महिमा गाता है। हर श्लोक में श्री हनुमान जी को राम भक्त के रूप में वर्णन किया गया है, जो लंका दहन, सेतु निर्माण और सीता खोज जैसे कार्यों से प्रसिद्ध हैं। यह स्तोत्र अपनी संक्षिप्तता और मधुर काव्य-शैली के कारण भक्तों के लिए नित्य पाठ करने हेतु अत्यंत उपयुक्त है ईसके पाठ से भक्तों की सभी मनोकामना पूरी होती है और उन्हे विशेष फल प्राप्त होता है।

श्री हनुमान नवरत्न स्तोत्र के संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अर्थ

श्रितजनपरिपालं रामकार्यानुकूलं
धृतशुभगुणजालं यातुतन्त्वार्तिमूलम्।
स्मितमुखसुकपोलं पीतपाटीरचेलं
पतिनतिनुतिलोलं नौमि वातेशबालम्।।

भावार्थ:
मैं वायुपुत्र हनुमान को प्रणाम करता हूँ — जो रामकार्य में नित संलग्न रहते हैं,
भक्तों की रक्षा करते हैं, जिनका मुख सदैव मुस्कुराता है,
जो शुभ गुणों के भंडार हैं और राक्षसों के कष्टों का अंत करते हैं।

दिनकरसुतमित्रं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं
शिशुतनुकृतचित्रं रामकारुण्यपात्रम्।
अशनिसदृशगात्रं सर्वकार्येषु जैत्रं
भवजलधिवहित्रं स्तौमि वायोः सुपुत्रम्।।(२)

भावार्थ:
मैं उस वायुपुत्र की स्तुति करता हूँ जो सूर्यपुत्र शनि के मित्र हैं,
पाँच मुख और तीन नेत्रों वाले हैं, वज्र के समान शरीर वाले हैं,
जो हर कार्य में विजय दिलाते हैं और भक्तों को जीवन-सागर से पार कराते हैं।

मुखविजितशशाङ्कं चेतसा प्राप्तलङ्कं
गतनिशिचरशङ्कं क्षालितात्मीयपङ्कम्।
नगकुसुमविटङ्कं त्यक्तशापाख्यशृङ्गं
रिपुहृदयलटङ्कं नौमि रामध्वजाङ्कम्।।
(३)

भावार्थ:
मैं उस हनुमान को प्रणाम करता हूँ जिनका मुख चाँद को भी लज्जित करता है,
जिन्होंने लंका पाकर राक्षसों का भय मिटाया,
जो पवित्र हृदय वाले, शाप-मुक्त, और शत्रुओं के हृदय को कंपाने वाले हैं।

दशरथसुतदूतं सौरसास्योद्गगीतं
हतशशिरिपुसूतं तार्क्ष्यवेगातिपातम्।
मितसगरजखातं मार्गिताशेषकेतं
नयनपथगसीतं भावये वातजातम्।।
(४)

भावार्थ:
वह दशरथसुत श्रीराम के दूत हैं, जिनकी गति गरुड़ के समान है,
जिन्होंने सीता माता का पता लगाया और रावण का अभिमान नष्ट किया।

निगदितसुखिरामं सान्त्वितैक्ष्वाकुवामं
कृतविपिनविरामं सर्वरक्षोऽतिभीमम्।
रिपुकुलकलिकामं रावणाख्याब्जसोमं
मतरिपुबलसीमं चिन्तये तं निकामम्।।
(५)

भावार्थ:
मैं उस हनुमान का ध्यान करता हूँ जिन्होंने राम को सुख का संदेश दिया,
जिनकी भयंकरता से राक्षस डरते हैं, और जिन्होंने रावण का दर्प चूर किया।

निहतनिखिलशूरः पुच्छवह्निप्रचारः
द्रुतगतपरतीरः कीर्तिताशेषसारः।
समसितमधुधारो जातपम्पावतारो
नतरघुकुलवीरः पातु वायोः कुमारः।। (६)

भावार्थ:
मैं उस वायुपुत्र को नमस्कार करता हूँ जिन्होंने लंका दग्ध की,
जिनकी गति बिजली से भी तेज है, जो सम्पूर्ण संसार में पूज्य हैं।

कृतरघुपतितोषः प्राप्तसीताङ्गभूषः
कथितचरितशेषः प्रोक्तसीतोक्तभाषः।
मिलितसखिहनूषः सेतुजाताभिलाषः
कृतनिजपरिपोषः पातु कीनाशवेषः।।
(७)

भावार्थ:
मैं उस हनुमान की स्तुति करता हूँ जिन्होंने सीता जी के आभूषण लाए,
राम को प्रसन्न किया, और सेतु निर्माण की प्रेरणा दी।

क्षपितबलिविपक्षो मुष्टिपातार्तरक्षः
रविजनपरिमोक्षो लक्ष्मणोद्धारदक्षः।
हृतमृतिपरपक्षो जातसीतापरोक्षो
विरमितरणदीक्षः पातु मां पिङ्गलाक्षः।।
(८)

भावार्थ:
वह पिंगलाक्ष हनुमान, जिन्होंने लक्ष्मण को जीवित किया,
जो मृत्यु और भय को दूर करते हैं, वे मुझे सदैव सुरक्षित रखें।

सुखितसुहृदनीकः पुष्पयानप्रतीकः
शमितभरतशोको दृष्टरामाभिषेकः।
स्मृतपतिसुखिसेको रामभक्तप्रवेकः
पवनसुकृतपाकः पातु मां वायुतोकः।।
(९)

भावार्थ:
हनुमान जी जिन्होंने राम के राज्याभिषेक का दर्शन किया,
जो सभी दुखों को हर लेते हैं, और परम भक्त हैं — वे वायुपुत्र मुझे सदैव रक्षा प्रदान करें।

श्री हनुमान नवरत्न स्तोत्र के लाभ और जाप विधि

श्री हनुमान नवरत्न स्तोत्र का नियमित पाठ करने से कई लाभ मिलते हैं जिसे शत्रुओं पर विजय , शत्रु भय और बाधाएं दूर होती हैं। और रोग निवारण शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है। साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। तथा हनुमान जी की कृपा से श्री राम की भक्ति गहरी होती है। संकट मोचन ग्रह दोष, भूत-प्रेत बाधा और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करता है। मंगलवार या शनिवार को ईस स्तोत्र का 108 बार पाठ करने से विशेष फल मिलता है।

जाप विधि:

श्री हनुमान स्तोत्र का पाठ करने से पहले स्नान करे फिर स्वच्छ वस्त्र पहनें। एक शुद्ध स्थान पर बैठें। उसके बाद एक लाल आसन पर हनुमान जी की मूर्ति या चित्र को स्थापित करे। मूर्ति पर धूप , दीप , सिंदूर और फूल अर्पित करे। स्तोत्र का पाठ शुरू करें। स्तोत्र को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ें। यदि संभव हो तो इसे 108 बार पढ़ें। अंत में हनुमान आरती के साथ समापन करें। ईस स्तोत्र का नियमित जाप करने से हनुमान जी शीघ्र प्रसन्न होते हैं। और भक्ति की सभी मनोकामना पूरी करते है

निष्कर्ष

हनुमान जी के भक्त जानते हैं कि उनका ये स्तोत्र कितना चमत्कारी होता है।अगर आप भक्ति में रुचि रखते हैं, तो हमारी साइट ज्ञान की बातें पर अन्य स्तोत्र जैसे कुलदेवी स्तोत्र और गायत्री स्तोत्र को जरूर पढ़ें तथा इस आर्टिकल को शेयर करें और कमेंट में अपनी अनुभूति बताएं! हनुमान जी की जय









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