श्री तुलसी स्तोत्र – माँ तुलसी की महिमा का दिव्य वर्णन (Shri Tulsi Stotra Lyrics with Meaning) – ज्ञान की बातें
श्री तुलसी स्तोत्र माता तुलसी को समर्पित है ये स्तोत्र माँ तुलसी की महिमा का वर्ण करता है हिंदू धर्म में तुलसी का पौधा देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। जो भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी हैं और भक्ति, समृद्धि, शुद्धता तथा मोक्ष की अधिष्ठात्री हैं। यही कारण है कि तुलसी को देवी के स्वरूप में पूजा जाता है। भारत के लगभग सभी हिंदू घरों में तुलसी का पौधा होता है। हर आंगन में प्रतिदिन तुलसी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि तुलसी की पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए तुलसी स्तोत्र का पाठ करना लाभकारी माना जाता है।
श्री तुलसी स्तोत्र का इतिहास और महत्व
तुलसी जी की महिमा ऐसी है कि इसका एक पत्ता भी श्राद्ध और यज्ञ आदि में बड़ा पुण्य देता है। इसलिए सनातन धर्म में तुलसी पूजन का काफी महत्व है। भगवान विष्णु जी की प्रिय होने के कारण तुलसी जी को हरिवल्लभा भी कहा जाता है। हिन्दू कथा के अनुसार वृंदा नाम की एक स्त्री थीं जिनका विवाह दानवराज जालंधर से हुआ था। जालंधर को हरा पाना असंभव था। तब भगवान विष्णु ने जालंधर को मारने की एक योजना बनाई। भगवान जानते थे कि जालंधर को तभी मारा जा सकता है जब उसकी पत्नी का पतिव्रता धर्म टूटेगा। एक दिन भगवान विष्णु जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के पास पहुंच गए और उसका सतीत्व भंग करा दिया और जालंधर मारा गया। जब वृंदा को इस छल का पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को शिला बनने का श्राप दे दिया। सृष्टि के पालनकर्ता के पत्थर बन जाने से ब्रह्मांड में असंतुलन की स्थिति हो गई। यह देखकर सभी देवी देवताओ ने वृंदा से प्रार्थना की तब वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप से मुक्त कर दिया , पर स्वयं आत्मदाह हो गयी जहां वृंदा भस्म हुईं, वहां तुलसी का पौधा उग आया। विष्णु भगवान ने वृंदा से कहा, हे वृंदा, तुम अपने सतीत्व के कारण मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। तब से हर साल कार्तिक महीने के देवउठनी एकादशी का दिन तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।
श्री तुलसी स्तोत्र के संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अर्थ
ध्यायेच्च तुलसीं देवीं श्यामां कमललोचनम्।
प्रसन्नां पद्मकहलावराभय चतुर्भुजाम्॥१
अर्थ:
भक्त को चाहिए कि वह तुलसी देवी का ध्यान करे —
जो श्यामवर्णा हैं, जिनकी आँखें कमल की पंखुड़ियों के समान हैं,
जो प्रसन्नमुखी हैं, जिनके चार भुजाएँ हैं, और जो पद्म (कमल), खलार (शंख), वर और अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं।
किरीटहार केयूर कुण्डलादिविभूषिताम्।
धवलांशुक संयुक्ता पद्मासन निषेदुषीम्॥२
अर्थ:
वे किरीट (मुकुट), हार, केयूर (बाहुबंध), कुण्डल आदि से अलंकृत हैं,
धवल वस्त्रों से युक्त हैं और कमलासन पर विराजमान हैं।
तुलसीं पुष्पसारां च सतीं पूता मनोहराम्।
कृतपापेघ्मदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमाम्॥३
अर्थ:
मैं उस तुलसी देवी का ध्यान करता हूँ जो पुष्पों का सार (मर्म) हैं,
पवित्र सती और मनोहर हैं, और जिनकी शक्ति पापों को जला डालने वाली अग्निशिखा के समान तेजस्विनी है।
पुष्पेषु तुलना यस्या नास्ति वेदेषु भाषितम्।
पवित्ररूपा सर्वासु तुलसी सा च कीर्तिता॥४
अर्थ:
वेदों ने कहा है कि तुलसी के समान कोई भी पुष्प नहीं है।
वह सर्वत्र पवित्ररूपा कही गई हैं, और सब पुष्पों में श्रेष्ठ मानी गई हैं।
तस्या मूले स्थितो ब्रह्मा मध्ये देवो जनार्दनः।
मंजर्यां वसते रूद्रस्य तुलसी तेन पावनी॥५
अर्थ:
तुलसी के मूल (जड़) में भगवान ब्रह्मा निवास करते हैं,
मध्यभाग में भगवान विष्णु (जनार्दन) और मंजरियों में भगवान रुद्र (शिव) का निवास है —
इसलिए तुलसी त्रिदेवमयी एवं परम पावनी है।
शिरोधार्या च सर्वेषामीप्सिता विश्वपावनी।
जीवनमुक्तां मुक्तिदां च भजे तां हरिभक्तिदाम्॥६
अर्थ:
वह तुलसी देवी सभी के द्वारा सिर पर धारण करने योग्य और विश्व को पवित्र करने वाली हैं।
वह स्वयं जीवन्मुक्ता (मुक्ति की अधिष्ठात्री) हैं और अपने भक्तों को हरिभक्ति तथा मोक्ष प्रदान करती हैं — ऐसी देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।
यस्या देवास्तुला नास्ति विश्वेषु निखिलेषु च।
तुलसी तेन विख्याता तां यामि शरणं प्रियाम्॥७
अर्थ:
जिस देवी की समता किसी भी देवता से नहीं — वे अद्वितीया हैं।
ऐसी प्रिय तुलसी देवी के शरण में मैं जाता हूँ।
कृष्णजीवनरूपा या शश्वत्प्रियतमा सती।
तेन कृष्णजीवनीति मम रक्षतु जीवनम्॥८
अर्थ:
जो श्रीकृष्ण की जीवनशक्ति के समान हैं, और जो सदा उनकी प्रिय सती हैं —
वह कृष्णजीवनी तुलसी मेरा जीवन सुरक्षित रखें।
वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारां नंदनी च तुलसी कृष्ण जीवनी॥९
अर्थ:
वह देवी वृन्दा हैं — वृन्दावन में निवास करने वाली,
संपूर्ण जगत द्वारा पूजिता और विश्व को पवित्र करने वाली।
वे पुष्पों की साररूपा, नंदिनी और कृष्ण की जीवनशक्ति हैं — ऐसी तुलसी माता को नमन।
श्री तुलसी स्तोत्र के लाभ और जाप विधि
वास्तु शास्त्र के अनुसार जिस जगह पर तुलसी का पौधा लगा होता है, वहां से सारी नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है और सकारात्मकता ऊर्जा आती है। इसी सकारात्मक ऊर्जा से परिवार में तरक्की का मार्ग खुलता है। तुलसी माता न केवल भगवान विष्णु की प्रिय हैं बल्कि समस्त भक्तों के कल्याण का माध्यम भी हैं। इन स्तोत्रों का नियमित पाठ करने से मन, तन और धन — तीनों की शुद्धि होती है। तुलसी पूजन जीवन में हरि भक्ति, शांति और मोक्ष प्रदान करता है।
जाप विधि:
श्री तुलसी स्तोत्र का पाठ करने से पहले स्नान करे स्वच्छ वस्त्र पहनें। तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाएं और धूपबत्ती लगाएं। पूजा के लिए एक स्वच्छ और पवित्र स्थान पर बैठें। और माँ तुलसी और भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करे। मूर्ति पर धूप , दीप, फूल , और घर में बना भोग अर्पित करे। अपनी मनोकामना को मन में दोहराते हुए तुलसी स्त्रोत का पाठ करने का संकल्प लें। एकाग्र मन से तुलसी स्त्रोत का पाठ करें। आप इसे संस्कृत में या हिंदी अनुवाद के साथ पढ़ सकते हैं। यदि संभव हो तो तुलसी के पौधे की 11 या 21 बार परिक्रमा करें। अंत में माँ तुलसी और भगवान विष्णु की आरती करें। और सभी लोगों में प्रसाद बांटें।
निष्कर्ष
हिंदू धर्म में तुलसी माता को अत्यंत पवित्र और विष्णु प्रिया माना जाता है। घर में तुलसी का पौधा लगाना और उसकी पूजा करना शुभ होता है। तुलसी माता की पूजा में इस तुलसी स्तोत्र का पाठ अवश्य शामिल करें और ऐसे ही और स्तोत्र जिसे गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र और श्री शालिग्राम स्तोत्र हमारी वेबसाईट ज्ञान की बातें पर जरूर पढे तथा इस आर्टिकल को शेयर करें और कमेंट में अपनी अनुभूति बताएं! जय तुलसी माता!