माता जानकी स्तोत्र – माँ जानकी की महिमा का दिव्य वर्णन ( Maa Janaki Stotra Lyrics with Meaning) – ज्ञान की बातें
जानकी स्तोत्र माँ जानकी को समर्पित है ये स्तोत्र माता जानकी के गुणों, शक्तियों, कर्मों, उद्देश्य का वर्ण करता है माता सीता जनक की पुत्री और श्री राम की अर्धांगिनी है माता सीता के अनेकों नाम है जिसे वैदेही, जनकनन्दिनी, जनकात्मजा , जानकी आदि धार्मिक शास्त्रों में माता सीता के इस पवित्र जानकी स्तोत्र का अत्यंत महत्व बताया गया है। जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रभु श्रीराम और माता सीता की विधिपूर्वक से पूजन करता है, उसे 16 महादानों, पृथ्वीदान, और समस्त तीर्थों के दर्शन का फल प्राप्त होता है। इसके साथ ही जानकी स्तोत्र का पाठ नियमित करने से मनुष्य के सभी कष्टों का नाश होता है। इसके पाठ से माता सीता प्रसन्न होकर धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति कराती है।
माता जानकी स्तोत्र का इतिहास और महत्व
जानकी स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति को सीता माता के अद्भुत गुणों के बारे में ज्ञान होता है सदियों पहले अयोध्या की प्रजा के द्वारा माता सीता के चरित्र पर जो लांछन लगाया गया था, उसको धोने के लिए उन्होंने इतना बड़ा त्याग किया कि वे युगों-युगों तक पवित्रता शब्द की पर्याय बन गयी। माता जानकी को त्याग, प्रेम, और दया का प्रतीक माना जाता हैं उनके कर्मों के कारण वे युगों-युगों तक मनुष्य जाति के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गयी और आज भी हम सभी उन्हें आदर्श मानकर उदाहरण देते हैं। ऐसे में जानकी स्तोत्र के माध्यम से जानकी माता के जीवन के बारे में अद्भुत वर्णन किया गया है।
माता जानकी स्तोत्र के संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अर्थ
नीलनीरज-दलायतेक्षणां लक्ष्मणाग्रज-भुजावलम्बिनीम्।
शुद्धिमिद्धदहने प्रदित्सतीं भावये मनसि रामवल्लभाम्।।**
अर्थ:
नील कमल-दल के समान जिनके नेत्र हैं, जो श्रीराम की भुजाओं का अवलंबन करती हैं, और जो अग्नि में अपनी पवित्रता सिद्ध करने हेतु प्रविष्ट हुईं — उन रामवल्लभा सीता माता का मैं मन में ध्यान करता हूँ।
रामपाद-विनिवेशितेक्षणामङ्ग-कान्तिपरिभूत-हाटकाम्।
ताटकारि-परुषोक्ति-विक्लवां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।**
अर्थ:
जिनकी दृष्टि सदा श्रीराम के चरणों में स्थिर रहती है, जिनकी अंगकांति सुवर्ण को भी मात करती है, और जो ताटकावध के समय राम के कटु वचनों से क्षुब्ध हो उठीं — उन श्रीराम की प्रिया जानकी माता का मैं ध्यान करता हूँ।
कुन्तलाकुल-कपोलमाननं, राहुवक्त्रग-सुधाकरद्युतिम्।
वाससा पिदधतीं हियाकुलां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।**
अर्थ:
जिनके कपोल बिखरे हुए केशों से वैसे ही ढके हैं जैसे राहु द्वारा ग्रहण किए गए चन्द्रमा का प्रकाश अंधकार से आवृत हो जाता है — जो लज्जा से अपना मुख वस्त्र से छिपा रही हैं, उन माता सीता का मैं ध्यान करता हूँ।
कायवाङ्मनसगं यदि व्यधां स्वप्नजागृतिषु राघवेतरम्।
तद्दहाङ्गमिति पावकं यतीं भावये मनसि रामवल्लभाम्।।**
अर्थ:
जो अग्नि में प्रवेश करते समय कहती हैं — “यदि मैंने शरीर, वाणी या मन से राघव के अतिरिक्त किसी और को स्थान दिया हो, तो हे अग्निदेव! मुझे भस्म कर दो” — ऐसी पवित्रता की प्रतिमूर्ति जानकी माता का मैं ध्यान करता हूँ।
इन्द्ररुद्र-धनदाम्बुपालकै: सद्विमान-गणमास्थितैर्दिवि।
पुष्पवर्ष-मनुसंस्तुताङ्घ्रिकां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।**
अर्थ:
स्वर्गलोक में इन्द्र, रुद्र, कुबेर और वरुण जैसे देवता विमानों से पुष्पवर्षा कर जिनके चरणों की स्तुति करते हैं, उन श्रीराम की पत्नी सीता माता की मैं मन में भावना करता हूँ।
संचयैर्दिविषदां विमानगैर्विस्मयाकुल-मनोऽभिवीक्षिताम्।
तेजसा पिदधतीं सदा दिशो भावये मनसि रामवल्लभाम्।।**
अर्थ:
देवगण विमानों से विस्मय से जिनका दर्शन करते हैं, और जो अपने तेज से दसों दिशाओं को आलोकित करती हैं उन रामवल्लभा जानकी माता का मैं ध्यान करता हूँ।
।। इति जानकीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
माता जानकी स्तोत्र के लाभ और जाप विधि
माता जानकी स्तोत्र के पाठ से माता जानकी की कृपा प्राप्त होती है और आपका जीवन धन, ऐश्वर्य और समृद्धि से भर जाता है घर में सुख-शांति और प्रेम बना रहता है। माता जानकी के व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन से अनेक शुभ फल प्राप्त होते हैं। यह व्रत विवाहित स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और सुहाग की दीर्घायु प्रदान करता है। और अविवाहित कन्याओं को मनचाहा जीवनसाथी मिलता है। यह व्रत मन को शांति प्रदान करता है और समस्त पापों का नाश करता है। नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं का भी नाश होता है। तथा व्यक्ति के भीतर पवित्रता, श्रद्धा और आत्मबल की वृद्धि होती है मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और सभी कष्ट दूर होते हैं।
जाप विधि:
माता जानकी स्तोत्र का पाठ करने से पहले प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें फिर पूजा स्थल पर चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता जानकी की प्रतिमा स्थापित करें। माता जानकी को रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीपक, नैवेद्य आदि अर्पित करें। माता जानकी के स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करे उच्चारण शुद्ध रखें; अर्थ जानकर पाठ करें। अंत में माँ की आरती करें और सभी को प्रसाद वितरण करें।
निष्कर्ष
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