श्री भैरव तांडव स्तोत्र – भगवान भैरव की महिमा का दिव्य वर्णन ( Shri Bhairav Tandav Stotra Lyrics with Meaning) – ज्ञान की बातें
श्री भैरव तांडव स्तोत्र भगवान भैरव को समर्पित स्तोत्र है भगवान भैरव, जो महादेव शिव के क्रोधावतार हैं, उनके तांडव रूप की महिमा का वर्णन करने वाला यह श्री भैरव तांडव स्तोत्र अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। यह स्तोत्र भक्तों को भय, शत्रु बाधा और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति दिलाता है जो व्यक्ति नकारात्मक शक्तियों और जीवन में कष्टों, परेशानियों से घिरा हुआ है। उसे इस काल भैरव तांडव स्तोत्र को नियमित रूप से अवश्य पाठ करना चाहिए। ईस स्तोत्र के नित्य पाठ से जीवन में साहस, आत्मविश्वास और सुरक्षा की अनुभूति होती है। विशेष रूप से भैरव अष्टमी या अमावस्या पर इसका जाप फलदायी होता है।
श्री भैरव तांडव स्तोत्र का इतिहास और महत्व
श्री भैरव ताण्डव स्तोत्रम् एक शक्तिशाली, दुर्लभ और अमोघ स्तोत्र हैं, जिसमें भगवान शिव के उग्र स्वरूप-भगवान भैरव की स्तुति की गई है। यह प्राचीन स्तोत्र भगवान भैरव (शिव के रौद्र रूप) की असीम शक्ति का वर्णन करता है। इस स्तोत्र को पढ़ने से ही काली शक्तियाँ और बुरी ताक़तें दूर भागती हैं, मन को शांति मिलती है और भगवान भैरव आपने भक्तों की रक्षा करते हैं इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से भगवान भैरव प्रसन्न होते हैं। यह स्तोत्र साधक को अदम्य साहस और आत्मबल प्रदान करने वाला माना गया है।
श्री भैरव तांडव स्तोत्र के संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अर्थ
श्लोक १
ॐ चण्डं प्रतिचण्डं करधृतदण्डं कृतरिपुखण्डं सौख्यकरं ।
लोकं सुखयन्तं विलसितसन्तं प्रकटितदन्तं नृत्यकरम् ॥
डमरुध्वनिशङ्खं तरलवतंसं मधुरहसन्तं लोकभरम् ।
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ १॥
हिन्दी अर्थ:
हे भगवान भैरव! आप अत्यंत उग्र और चण्ड रूप वाले हैं, आपके हाथ में दण्ड (अस्त्र) सुशोभित है।
आपने अपने शत्रुओं का संहार किया है और भक्तों को सुख देनेवाले हैं।
आप नृत्य में लीन हैं, आपके मुख से दाँतों की शोभा प्रकट होती है।
डमरु और शंख की ध्वनि से सम्पूर्ण जगत गुंजायमान है।
आपका चेहरा मधुर मुस्कान से भरा हुआ है, जो संसार को आनंद देता है।
मैं उस भूतेश, प्रकट महेश, भैरव रूप धारण करने वाले, कष्ट हरने वाले प्रभु की स्तुति करता हूँ।
श्लोक २
चर्चितसिन्दूरं रणभूविदूरं दुष्टविदूरं श्रीनिकरं ।
किङ्किणिगणरावं त्रिभुवनपावं खर्प्परसावं पुण्यभरम् ॥
करुणामयवेषं सकलसुरेशं मुक्तसुकेशं पापहरं ।
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ २॥
हिन्दी अर्थ:
आप सिन्दूर से अलंकृत हैं, रणभूमि में अजेय हैं और दुष्टों से सदा दूर रहते हैं।
आपके शरीर पर किङ्किणि (घुँघरू) की ध्वनि तीनों लोकों को पवित्र करती है।
आपका स्वरूप करुणामय है, आप समस्त देवताओं के अधिपति हैं,
आपके केश स्वतंत्र रूप से बिखरे हैं, और आप सभी पापों का नाश करते हैं।
मैं उस भैरव भगवान की वंदना करता हूँ जो कष्टों का नाशक है।
श्लोक ३
कलिमलसंहारं मदनविहारं फणिपतिहारं शीघ्रकरं ।
कलुषं शमयन्तं परिभृतसन्तं मत्तदृगन्तं शुद्धतरम् ॥
गतिनिन्दितकेशं नर्तनदेशं स्वच्छकशं सन्मुण्डकरं ।
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ३॥
हिन्दी अर्थ:
आप कलियुग के पापों का संहार करते हैं, और मनोविकारों को नष्ट करते हैं।
आप सर्पराज फणि को भी वश में रखते हैं, और शीघ्र कृपा करने वाले हैं।
आप पापों को शांत करते हैं, संतजनों से घिरे रहते हैं, और शुद्धतम हैं।
आपके केश गति में झूमते हैं, आप नृत्य के अधिपति हैं, और आपके हाथ में मुण्ड (खोपड़ी) सुशोभित है।
ऐसे भैरव का मैं भजन करता हूँ।
श्लोक ४
कठिनस्तनकुम्भं सुकृतसुलम्भं कालीडिम्भं खड्गधरं ।
वृतभूतपिशाचं स्फुटमृदुवाचं स्निग्धसुकाचं भक्तभरम् ॥
तनुभाजितशेषं विलमसुदेशं सर्वसुरेशं प्रीतिनरं ।
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ४॥
हिन्दी अर्थ:
आपका स्वरूप गंभीर और भयंकर है, किंतु भक्तों के लिए सुलभ है।
आप खड्ग (तलवार) धारण करते हैं और भूत-पिशाचों को अपने अधीन रखते हैं।
आपका वचन मृदुल और मधुर है, और आप भक्तों से सदा संतुष्ट रहते हैं।
आप सर्वश्रेष्ठ देव हैं, समस्त लोकों के स्वामी हैं।
ऐसे प्रभु भैरव की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक ५
ललिताननचन्द्रं सुमनवितन्द्रं बोधितमन्द्रं श्रेष्ठवरं ।
सुखिताखिललोकं परिहृतशोकं शुद्धविलोकं पुष्टिकरम् ॥
वरदाभयहारं तरलिततारं क्षुद्रविदारं तुष्टिकरं ।
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ५॥
हिन्दी अर्थ:
आपका मुख चन्द्र समान ललित है, और आपके भक्तों का मन प्रसन्न कर देता है।
आप तीनों लोकों को सुखी करते हैं, सबके शोकों को दूर करते हैं।
आप शुद्ध दृष्टि वाले, भक्तों को पुष्टि देने वाले, वरद और अभय देने वाले हैं।
आप दुष्टों का नाश करने वाले और भक्तों को तुष्टि देने वाले हैं।
ऐसे भैरव भगवान को मेरा बारम्बार नमस्कार।
श्लोक ६
सकलायुधभारं विजनविहारं सुश्रविशारं भ्रष्टमलं ।
शरणागतपालं मृगमदभालं सञ्जितकालं स्वेष्टबलम् ॥
पदनूपूरशिञ्जं त्रिनयनकञ्जं गुणिजनरञ्जन कुष्ठहरं ।
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ६॥
हिन्दी अर्थ:
आपके पास सभी दिव्य आयुध हैं, आप निर्जन स्थलों में निवास करते हैं।
आप अत्यंत ज्ञानी हैं, पापरहित हैं, और शरणागतों की रक्षा करते हैं।
आपके मस्तक पर चन्दन और मृगमद सुशोभित है।
आपका रूप त्रिनयनयुक्त कमल के समान है।
आप गुणवान भक्तों को प्रसन्न करते हैं और रोगों का नाश करते हैं।
मैं उस भैरव भगवान की आराधना करता हूँ।
श्लोक ७
मदयुतसंरावं प्रकटितभावं विश्वसुभावं ज्ञानपदं ।
रक्तांशुकजोषं परिकृततोषं नाशितदोषं सन्मतिदम् ॥
कुटिलभ्रुकुटीकं ज्वरधननी कं विसरन्ध्रीकं प्रेमभरं ।
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ७॥
हिन्दी अर्थ:
आपका स्वरूप मद से युक्त और आनंदित है।
आपका भाव प्रकट और विश्वहितकारी है।
आप ज्ञान के अधिष्ठाता हैं, लाल वस्त्र धारण करते हैं।
आप सभी दोषों को नष्ट करते हैं, शुभ बुद्धि प्रदान करते हैं।
आपकी भौंहें कुटिल हैं, जो ज्वर और दुखों को नष्ट करती हैं।
आपका हृदय प्रेम से परिपूर्ण है — मैं उस भैरव की वंदना करता हूँ।
श्लोक ८
परिनिर्जितकामं विलसितवामं योगिजनाभं योगेशं ।
बहुमद्यपनाथं गीतसुगाथं कृष्टसुनाथं वीरेशम् ॥
कलयन्तमशेषं भृतजनदेशं नृत्यसुरेशं दत्तवरं ।
भज भज भूतेशं प्रकटमहेशं भैरववेषं कष्टहरम् ॥ ८॥
हिन्दी अर्थ:
आपने कामदेव को वश में किया है, और आपके पास वामदेव स्वरूप का तेज है।
आप योगियों द्वारा पूज्य योगेश्वर हैं।
आपको मधु का आस्वाद प्रिय है, आप गीत और स्तुति से प्रसन्न होते हैं।
आप अपने भक्तों के रक्षक हैं, और देवताओं के साथ नृत्य करने वाले हैं।
आप दान देने वाले और वरदाता हैं।
ऐसे कष्टनाशक भैरव को मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ।
श्री भैरव तांडव स्तोत्र के लाभ और जाप विधि
यह सबसे शक्तिशाली काल भैरव मंत्र व्यक्ति के दोषों के कारण उत्पन्न होने वाले बुरे परिणामों से रक्षा करता है। काल भैरव मंत्र व्यक्ति के मन से सभी प्रकार के बुरे विचारों और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में मदद करता है। यह समस्याओं, संघर्षों, शोक, पीड़ा और विषाक्त संबंधों को ठीक करने में मदद करता है। इस स्तोत्र के माध्यम से व्यक्ति को भगवान शिव और भगवान भैरव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह मंत्र व्यक्ति की आयु बढ़ाने और स्वास्थ्य में सुधार लाने में सहायक है
जाप विधि:
श्री भैरव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से पहले प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर पूजा स्थल पर भगवान भैरव की मूर्ति या चित्र को स्थापित करे। भगवान को धूप, दीप ,और फूल अर्पित करे। लाल या काले रंग के आसन पर बैठ कर भैरव तांडव स्तोत्र का पाठ करे। पाठ करते समय मुख दक्षिण दिशा की ओर रखें, क्योंकि यह भगवान भैरव की मुख्य दिशा मानी जाती है। अंत में भगवान भैरव की आरती करें और सभी को प्रसाद वितरण करें।
निष्कर्ष
इस काल भैरव तांडव स्तोत्र का पाठ रात्रि में या भैरव मंदिर में करना शुभ माना जाता है। अगर आप भी भक्ति में रुचि रखते हैं, तो हमारी साइट ज्ञान की बातें पर अन्य स्तोत्र जैसे माता जानकी स्तोत्र और श्री हनुमान नवरत्न स्तोत्र जरूर पढ़ें तथा इस आर्टिकल को शेयर करें और कमेंट में अपनी अनुभूति बताएं! ॐ भैरवाय नमः





