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काशी विश्वनाथ मंदिर , उत्तर प्रदेश (Kashi Vishwanath Mandir , Uttar Pradesh)

अक्टूबर 18, 2025 अमित भारद्वाज 0 comments

काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी शहर में पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित एक हिंदू मंदिर है । भारत के सबसे लंबे समय से बसे शहरों में से एक वाराणसी , जिसे बनारस या काशी के नाम से भी जाना जाता है, भारत के सात सबसे पवित्र शहरों में से एक है और कई महत्वपूर्ण हिंदू मंदिरों का घर है। वाराणसी एक ऐसा स्थान होने के लिए भी जाना जाता है जहाँ आयुर्वेद और योग परंपराओं के निर्माता पंतजलि ने निवास किया और शिक्षा दी थी। यह एक महत्वपूर्ण बौद्ध शहर भी है, क्योंकि कहा जाता है कि बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यहीं दिया था। यह मंदिर हिंदू देवताओं में सबसे पवित्र शिव की पूजा के लिए वाराणसी के बारह ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक है। अन्य सात ज्योतिर्लिंग मंदिर विश्वनाथ के बहुत करीब हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में बना काशी विश्वनाथ मंदिर, हिंदू धर्म में सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक है। काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। इसका उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में भगवान शिव की दिव्य ऊर्जा के केंद्र के रूप में किया गया है। वाराणसी हमेशा भगवान शिव से जुड़ा रहा है। ऐसा कहते हैं कि भगवान शिव ने इस शहर को मुक्ति के स्थान के रूप में स्थापित किया था। माना जाता है कि मूल मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी के आसपास हुआ था। हालांकि, इस मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए और फिर इसका पुनर्निर्माण हुआ जिससे इसका इतिहास काफ़ी उथल-पुथल भरा हो गया। 

मध्यकाल के दौरान, मंदिर पर आक्रमणकारियों ने बार-बार हमला किया। पहला हमला 12वीं शताब्दी में कुतुब-उद-दीन ऐबक के शासनकाल में हुआ। इसके बाद मंदिर का पुनर्निर्माण समर्पित हिंदू शासकों ने कराया जिसे 15वीं शताब्दी के अंत में सिकंदर लोदी ने फिर से नष्ट कर दिया। सबसे उल्लेखनीय पुनर्निर्माण 16वीं शताब्दी के अंत में अकबर के दरबार में मंत्री राजा टोडर मल के शासनकाल के दौरान हुआ। यह मंदिर 1669 में औरंगजेब के ध्वस्त कराने से पहले लगभग एक शताब्दी तक खड़ा रहा। 1669 में औरंगजेब ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया

वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर को 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था, जिन्हें उनकी भक्ति और कई हिंदू मंदिरों के जीर्णोद्धार के प्रयासों के लिए याद किया जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर को 1835 में सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह ने सोने से सजवाया था। उन्होंने मंदिर के गुंबद और शिखर को चमकाने के लिए एक टन सोना दान किया था। 

2019 में मंदिर को पहले से भव्य बनाने और भक्तों के लिए मंदिर का रास्ता आसान बनाने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण के तहत काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना शुरू की गई थी। इस परियोजना में मंदिर परिसर का विस्तार किया गया और इसे सीधे गंगा नदी घाटों से जोड़ा गया।

काशी विश्वनाथ मंदिर के खुलने और बंद होने का समय

सुबह: 4 बजे – 11:00 बजे

दोपहर: 12:00 बजे – 7:00 बजे

रात : 9:00 बजे – 10:00 बजे

काशी विश्वनाथ मंदिर पूजा का समय

सुबह की आरती: 3:00 बजे – 4:00 बजे ( ईस आरती में बस टिकट धारकों को शामिल होने की अनुमति होती है। )

दोपहर की आरती: 11:30 बजे – 12:00 बजे

शाम की आरती: 7 बजे – 8:30 बजे

रात की आरती: 10:30 बजे – 11 बजे तक

काशी विश्वनाथ मंदिर की वास्तुकला

मंदिर की वास्तुकला नागर शैली का एक अद्भुत उदाहरण है, जिसमें एक विशाल शिखर और जटिल नक्काशीदार पत्थर के अग्रभाग हैं। मुख्य गर्भगृह में पवित्र ज्योतिर्लिंग स्थापित है, जो भगवान शिव के बारह सबसे पूजनीय स्वरूपों में से एक है। परिसर के भीतर अन्य देवताओं को समर्पित सहायक मंदिर स्थित हैं, जो इस हलचल भरे शहर में एक आध्यात्मिक केंद्र का निर्माण करते हैं। प्रांगण भक्तों के एकत्र होने और प्रार्थना करने के लिए एक शांत स्थान प्रदान करता है। संगमरमर और पत्थर का उपयोग, अलंकृत द्वारों और हिंदू देवताओं को दर्शाती विस्तृत मूर्तियों के साथ, मंदिर के सौंदर्य आकर्षण को और बढ़ाता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर की कथा

धार्मिक किदवंती के अनुसार, एक बार देवताओं ने भगवान ब्रह्मा देव और विष्णु जी से पूछा कि- हे जगत के रचयिता और पालनहार कृपा कर बताएं कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन है? देवताओं के इस सवाल से ब्रह्मा और विष्णु जी में श्रेष्ठता साबित करने की होड़ लग गई। इसके बाद सभी देवतागण, ब्रह्मा और विष्णु जी सहित कैलाश पहुंचे और भगवान भोलेनाथ से पूछा गया कि- हे देवों के देव महादेव आप ही बताएं कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन हैं? देवताओं के इस सवाल पर तत्क्षण भगवान शिव जी के तेजोमय और कांतिमय शरीर से ज्योति कुञ्ज निकली, जो नभ और पाताल की दिशा में बढ़ रही थी। तब महादेव ने ब्रह्मा और विष्णु जी से कहा- आप दोनों में जो सबसे पहले इस ज्योति की अंतिम छोर पर पहुंचेंगे। वहीं, सबसे श्रेष्ठ है। इसके बाद ब्रह्मा और विष्णु जी अनंत ज्योति की छोर तक पहुंचने के लिए निकल पड़े। कुछ समय बाद ब्रम्हा और विष्णु जी लौट आए तो शिव जी ने उनसे पूछा-हे देव क्या आपको अंतिम छोर प्राप्त हुआ। इस पर विष्णु जी ने कहा-हे महादेव यह ज्योति अनंत है, इसका कोई अंत नहीं है। जबकि ब्रम्हा जी झूठ बोल गए, उन्होंने कहा- मैं इसके अंतिम छोर तक पहुंच गया था। यह जान शिव जी ने विष्णु जी को श्रेष्ठ घोषित कर दिया। इससे ब्रह्मा जी क्रोधित हो उठें, और शिव जी के प्रति अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करने लगे। यह सुन भगवान शिव क्रोधित हो उठें और उनके क्रोध से काल भैरव की उत्पत्ति हुई, जिन्होंने ब्रम्हा जी के चौथे मुख को धड़ से अलग कर दिया। उस समय ब्रह्मा जी को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने तत्क्षण भगवान शिव जी से क्षमा याचना की। इसके बाद कैलाश पर्वत पर काल भैरव देव के जयकारे लगने लगे। यह ज्योति द्वादश ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ कहलाया।

काशी विश्वनाथ मंदिर कैसे पहुँचें?

हवाई जहाज: वाराणसी और नई दिल्ली के बीच प्रत्यक्ष दैनिक उड़ान कनेक्शन है यह वाराणसी को दिल्ली, आगरा, खजुराहो, कलकत्ता, मुंबई, लखनऊ, गया, चेन्नई, अहमदाबाद, हैदराबाद, भुवनेश्वर आदि से जोड़ता है। हवाई सेवाएँ टर्मिनल मैनेजर बाबतपुर एयरपोर्ट : 0542-2623060 एयरपोर्ट डायरेक्टर : 0542-2622155

ट्रेन: वाराणसी एक महत्वपूर्ण और प्रमुख रेल जंक्शन है। शहर पूरे देश के सभी महानगरों और प्रमुख शहरों से रेल सेवा से जुड़ा है। नई दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई, ग्वालियर, मेरठ, इंदौर, गुवाहाटी, इलाहाबाद, लखनऊ, देहरादून से सीधी रेल सेवा से जुड़ा है.

सड़क: वाराणसी (राष्ट्रीय राजमार्ग) एनएच 2 को कलकत्ता से दिल्ली तक, एनएच 7 से कन्या कुमारी और एनएच 29 गोरखपुर के साथ जुड़ा हुआ है, जो पूरे देश में सभी प्रमुख सड़कों से जुड़ा हुआ है। कुछ महत्वपूर्ण सड़क की दूरीः आगरा 565 किमी, इलाहाबाद 128 किमी, भोपाल 791 किमी, बोधगया 240 किमी, कानपुर 330 किमी, खजुराहो 405 किमी, लखनऊ 286 किमी, पटना 246 किमी, सारनाथ 10 किमी। , लुंबिनी (नापोल) 386 किमी, कुशी नगर 250 किमी (गोरखपुर के माध्यम से), यूपीएसआरटीसी बस स्टैंड, शेर शाह सूरी मार्ग, गोलगड्डा

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